हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 18.3.35

कांड 18 → सूक्त 3 → मंत्र 35 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
ऊ॑र्ध्वायां त्वादि॒शि पु॒रा सं॒वृतः॑ स्व॒धाया॒मा द॑धामि बाहु॒च्युता॑ पृथि॒वी द्यामि॑वो॒परि॑ । लो॑क॒कृतः॑ पथि॒कृतो॑ यजामहे॒ ये दे॒वानां॑ हु॒तभा॑गा इ॒ह स्थ ॥ (३५)
हे प्रेत! मैं तुझे ऊपर की दिशा में स्थित स्वधा नाम की पितृ देवता में स्थापित करता हूं. मैं पहले से ही कंबल से ढका हुआ हूं. जिस प्रकार पुण्य करने वालों द्वारा ब्राह्मणों को दान की हुई पृथ्वी ऊपर की दिशा में स्थित स्वर्ग का पालन करती है, उसी प्रकार स्वधा देवी तुम्हारा पालन करें. पुण्य के फल के रूप में स्वर्ग के मार्ग का प्रवर्तन करने वालों की पूजा मैं हवि के द्वारा करता हूं. हे देवगण! तुम इस यज्ञ में भाग लेने वाले बनो. (३५)
O ghost! I install you in a pitra devta named Swadha located in the upward direction. I am already covered with a blanket. Just as the earth donated to Brahmins by those who do virtue follows heaven located in the upward direction, so swadha devi follow you. As the fruit of virtue, I worship those who initiate the way to heaven through Havi. O Gods! You become participants in this yajna. (35)