हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 18.3.60

कांड 18 → सूक्त 3 → मंत्र 60 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 3
शं॑ ते नीहा॒रोभ॑वतु॒ शं ते॑ प्रु॒ष्वाव॑ शीयताम् । शीति॑के॒ शीति॑कावति॒ ह्लादि॑के॒ह्लादि॑कावति । म॑ण्डू॒क्यप्सु शं भु॑व इ॒मं स्वग्निं श॑मय ॥ (६०)
हे प्रेत पुरुष! पाला तेरे लिए सुखकारी हो तथा जल तुझे सुखी करता हुआ वर्षा करे. हे शीतकारिणी जड़ीबूटियों से व्याप्त पृथ्वी तथा हे सुख उत्पन्न करने वाली मंडूकपर्णी ओषधि! तू इस दग्ध पुरुष को सुख प्रदान कर तथा जलाने वाली अग्नि को शांत कर. (६०)
O ghost man! May pala be pleasant for you and may the water make you happy and rain. O earth full of cold-karini herbs and O manduqaparni medicine that produces happiness! Give happiness to this man of agni and calm the agni that burns. (60)