हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 18.4.25

कांड 18 → सूक्त 4 → मंत्र 25 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 18)

अथर्ववेद: | सूक्त: 4
अ॑पू॒पापि॑हितान्कु॒म्भान्यांस्ते॑ दे॒वा अधा॑रयन् । ते ते॑ सन्तु स्व॒धाव॑न्तो॒मधु॑मन्तो घृत॒श्चुतः॑ ॥ (२५)
हे प्रेत! हवि के अधिकारी जिन देवताओं ने चरु से पूर्ण कलशों को अपने भाग के रूप में ग्रहण किया है, वे चरु तुझे परलोक में स्वधा से युक्त करें. (२५)
O ghost! May the deities, who have taken the full urns from charu as their part, may the charu equip you with swadha in the hereafter. (25)