अथर्ववेद (कांड 18)
परा॑ यात पितरःसो॒म्यासो॑ गम्भी॒रैः प॒थिभिः॑ पू॒र्याणैः॑ । अधा॑ मासि॒ पुन॒रा या॑त नोगृ॒हान्ह॒विरत्तुं॑ सुप्र॒जसः॑ सु॒वीराः॑ ॥ (६३)
हे सोमरस प्राप्त करने के अधिकारी पितरो! तुम पितृयानों से अपने लोक को गमन करो तथा अमावस्या के दिन हवि भक्षण करने हेलु हमारे घर पुनः आना. हमारे घर शोभन पुत्रों और उत्तम वीरों से युक्त हों. (६३)
O Piro, O Sommers, the right to receive! You go to your world through pitrayanas and come back to our house to eat on amavasya day. May our homes be filled with shobhan sons and best heroes. (63)