अथर्ववेद (कांड 18)
च॒न्द्रमा॑अ॒प्स्वन्तरा सु॑प॒र्णो धा॑वते दि॒वि । न वो॑ हिरण्यनेमयः प॒दं वि॑न्दन्तिविद्युतो वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥ (८९)
सुंदर किरणों वाला चंद्रमा जलों के भीतर निवास करता हुआ दौड़ता रहता है. हे द्यावा पृथ्वी! तुम्हारी स्थिति को सोने के चमकीले सीमा भाग वाली बिजलियां प्राप्त नहीं कर पाती हैं. तुम दोनों मेरी इस स्तुति को जानो. (८९)
The moon with beautiful rays keeps running while living inside the waters. O earth! Your position is not able to be achieved by lightning with bright border areas of gold. You both know this praise of mine. (89)