अथर्ववेद (कांड 19)
श॒तका॑ण्डो दुश्च्यव॒नः स॒हस्र॑पर्ण उत्ति॒रः । द॒र्भो य उ॒ग्र ओष॑धि॒स्तं ते॑ बध्ना॒म्यायु॑षे ॥ (१)
हे मृत्यु के भय से दुःखी पुरुष! मैं सौ गांठों वाली, दुःख में चबाने योग्य, हजार पुत्रों वाली एवं उत्तम दर्भ उग्र ओषधि अर्थात् जड़ीबूटी है, उसे मैं दीर्घ आयु प्राप्त करने के लिए बांधता हूं. (१)
O man grieving with the fear of death! I bind a hundred knots, chewable in sorrow, with a thousand sons and the best darbha ugra medicine i.e. herbs, to get long life. (1)