अथर्ववेद (कांड 19)
श॒तका॑ण्डो दुश्च्यव॒नः स॒हस्र॑पर्ण उत्ति॒रः । द॒र्भो य उ॒ग्र ओष॑धि॒स्तं ते॑ बध्ना॒म्यायु॑षे ॥ (१)
हे मृत्यु के भय से दुःखी पुरुष! मैं सौ गांठों वाली, दुःख में चबाने योग्य, हजार पुत्रों वाली एवं उत्तम दर्भ उग्र ओषधि अर्थात् जड़ीबूटी है, उसे मैं दीर्घ आयु प्राप्त करने के लिए बांधता हूं. (१)
O man grieving with the fear of death! I bind a hundred knots, chewable in sorrow, with a thousand sons and the best darbha ugra medicine i.e. herbs, to get long life. (1)
अथर्ववेद (कांड 19)
नास्य॒ केशा॒न्प्र व॑पन्ति॒ नोर॑सि ताड॒मा घ्न॑ते । यस्मा॑ अच्छिन्नप॒र्णेन॑ द॒र्भेन॒ शर्म॒ यच्छ॑ति ॥ (२)
उस के केशों को मृत्यु दूत नहीं खींचते हैं तथा राक्षस, पिशाच आदि हृदय में चोट पहुंचा कर उसी की हिंसा नहीं करते, जिसे प्रयोक्ता बिना कटे हुए पत्तों वाले दर्भ से बनी मणि सुख पहुंचाती है. (२)
His hair is not pulled by the messenger of death and demons, vampires, etc. do not do violence by hurting the heart, which the user gives pleasure to the gem made of uncut leaves. (2)
अथर्ववेद (कांड 19)
दि॒वि ते॒ तूल॑मोषधे पृथिव्यामसि॒ निष्ठि॑तः । त्वया॑ स॒हस्र॑काण्डे॒नायुः॒ प्र व॑र्धयामहे ॥ (३)
हे सौ गांठों वाली दर्भ नामक ओषधि! तेरा ऊपर वाला भाग ह्युलोक अर्थात् स्वर्ग में है तथा तू पृथ्वी पर स्थित है. इस प्रकार पृथ्वी से स्वर्ग तक व्याप्त होने वाली तथा हजार गांठों वाली दर्भ नाम की ओषधि के द्वारा मैं तेरी आयु को बढ़ाता हूं. (३)
O medicine called a hundred knots of darbha! Your upper part is in hell and you are located on earth. In this way, I increase your life by a medicine called Darbha, which spreads from earth to heaven and has a thousand knots. (3)
अथर्ववेद (कांड 19)
ति॒स्रो दि॒वो अत्य॑तृणत्ति॒स्र इ॑माः पृथि॒वीरु॒त । त्वया॒हं दु॒र्हार्दो॑ जि॒ह्वां नि तृ॑णद्मि॒ वचां॑सि ॥ (४)
हे हजार गांठों वाली ओषधि दर्भ! तू तीन स्वर्गो का अतिक्रमण गई है तथा तूने इन तीन पृथ्वियों का अतिक्रमण किया है. मैं तेरे द्वारा उस की जीभ को लपेटता हूं जो मेरे प्रति दुर्भावना रखता है तथा उस के वचनों को बांधता हूं. (४)
O thousand knots of medicine! You have transgressed the three heavens and you have transgressed these three earths. I wrap through you the tongue of him who has ill-will towards me and binds his words. (4)
अथर्ववेद (कांड 19)
त्वम॑सि॒ सह॑मानो॒ऽहम॑स्मि॒ सह॑स्वान् । उ॒भौ सह॑स्वन्तौ भू॒त्वा स॒पत्ना॑न्सहिषीमहि ॥ (५)
हे सौ गांठों वाली ओषधि दर्भ! तुम शत्रुओं को वश में करने वाली हो तथा मैं शत्रु की हिंसा के साधन और बल से युक्त हूं. हम दोनों शत्रु को दबा के स्वभाव वाले हो कर अपने शत्रुओं को पराजित करें. (५)
O hundred knots of medicine! You are the one who subdues the enemies and I am equipped with the means and strength of the enemy's violence. Both of us should defeat our enemies by suppressing the enemy. (5)
अथर्ववेद (कांड 19)
सह॑स्व नो अ॒भिमा॑तिं॒ सह॑स्व पृतनाय॒तः । सह॑स्व॒ सर्वा॑न्दु॒र्हार्दः॑ सु॒हार्दो॑ मे ब॒हून्कृ॑धि ॥ (६)
हे सौ गांठों वाली ओषधि दर्भ! हमारे शत्रुओं अथवा पापों को पराजित करो. जो लोग हमारे विरुद्ध सेना एकत्र कर रहे हैं, उन को भी पराजित करो. मेरे प्रति दुर्भावना रखने वाले व्यक्तियों का विनाश करो और मेरे मित्रों की संख्या बढ़ाओ. (६)
O medicine with a hundred lumps! Defeat our enemies or sins. Defeat those who are gathering armies against us. Destroy those who have ill-will towards me and increase the number of my friends. (6)
अथर्ववेद (कांड 19)
द॒र्भेण॑ दे॒वजा॑तेन दि॒वि ष्ट॒म्भेन॒ शश्व॒दित् । तेना॒हं शश्व॑तो॒ जनाँ॒ अस॑नं॒ सन॑वानि च ॥ (७)
देवों के समीप से उत्पन्न, द्युलोक अर्थात् स्वर्ग में स्थित रहने वाले दर्भ के द्वारा मैं सर्वदा दीर्घजीवी जनों को प्राप्त करूं. (७)
I can always attain long-lived people through duloka, that is, the door who lives in heaven, born near the gods. (7)
अथर्ववेद (कांड 19)
प्रि॒यं मा॑ दर्भ कृणु ब्रह्मराज॒न्याभ्यां शू॒द्राय॒ चार्या॑य च । यस्मै॑ च का॒मया॑महे॒ सर्व॑स्मै च वि॒पश्य॑ते ॥ (८)
हे दर्भ! मुझ धारणकर्ता को ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र तथा श्रेष्ठ जनों का प्रिय बनाओ. अनुलोम और प्रतिलोम जाति के मध्य जिन लोगों को मैं अपना प्रिय बनाना चाहूं, पाप अन्वेषण करने वाले उस पुरुष को मेरा प्रिय बनाओ. (८)
O darbh! Make me the holder dear to Brahmins, Kshatriyas, Shudras and superiors. Dear to the man who discovers sins of those whom I want to make my beloved between the Anulom and the Antilom race. (8)