हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 51
अयु॑तो॒ऽहमयु॑तो म आ॒त्मायु॑तं मे॒ चक्षु॒रयु॑तं मे॒ श्रोत्र॑मयु॑तो मे प्रा॒णोऽयु॑तो मेऽपा॒नोऽयु॑तो मे व्या॒नोऽयु॑तो॒ऽहं सर्वः॑ ॥ (१)
कर्म का अनुष्ठान करने का इच्छुक मैं पूर्ण हूं. मेरा शरीर पूर्ण है, मेरी आत्मा पूर्ण है, मेरे नेत्र, कान, मेरी प्राण वायु, मेरी अपान वायु तथा मेरी व्यान वायु पूर्ण है. इस प्रकार मैं सभी दृष्टि से पूर्ण हूं. (१)
I am complete to do the ritual of karma. My body is complete, my soul is full, my eyes, ears, my life air, my apana vayu and my vyan vayu are full. Thus I am complete in all respects. (1)

अथर्ववेद (कांड 19)

अथर्ववेद: | सूक्त: 51
दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्यां॒ प्रसू॑त॒ आ र॑भे ॥ (२)
हे कर्म! मैं सब के प्रेरक सविता देव की आज्ञा से, अश्चिनीकुमारों की भुजाओं से तथा पूषा देव के हाथों से तेरा आरंभ करता हूं. (२)
O karma! I start you with the command of Savita Dev, the motivator of all, with the arms of Ashchinikumars and with the hands of Pusha Dev. (2)