अथर्ववेद (कांड 19)
प्रा॒तःप्रा॑तर्गृ॒हप॑तिर्नो अ॒ग्निः सा॒यंसा॑यं सौमन॒सस्य॑ दा॒ता । वसो॑र्वसोर्वसु॒दान॑ ए॒धीन्धा॑नास्त्वा श॒तंहि॑मा ऋधेम ॥ (४)
हे गृहपति द्वारा आधान की गई अग्नि! तुम सायं और प्रातः हमें सुख देने वाली बनो. हे धन प्रदान करने वाली अग्नि! तुम वृद्धि प्रदान करो. हम तुम्हें हवि द्वारा दीप्त करते हुए सौ वर्ष तक जीवित रहें. (४)
O agni extinguished by the housekeeper! May you be the giver of happiness in the evening and in the morning. O agni that gives wealth! You provide growth. May we live for a hundred years, lighting you up by eve. (4)