अथर्ववेद (कांड 19)
उपा॒स्मान्प्रा॒णो ह्व॑यता॒मुप॑ प्रा॒णं ह॑वामहे । वर्चो॑ जग्राह पृथि॒व्यन्तरि॑क्षं॒ वर्चः॒ सोमो॒ बृह॒स्पति॑र्विध॒त्ता ॥ (२)
शरीर को धारण करने वाली प्राण वायु मानस यज्ञ करने वाले हम को दीर्घ जीवन की अनुमति प्रदान करे. हम प्राण वायु को अपने शरीर में चिरकाल तक स्थित रहने के लिए बुलाते हैं. पृथ्वी और अंतरिक्ष ने हमें देने के लिए ही तेज ग्रहण किया है. हे सोम! बृहस्पति एवं अग्नि अथवा सूर्य हमें देने के लिए तेज ग्रहण करें. (२)
May the life that holds the body allow us to have a long life. We call the prana vayu to remain in our body forever. Earth and space have taken a sharp eclipse only to give us. O Mon! Jupiter and Agni or Sun take a sharp eclipse to give us. (2)