हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 2.11.1

कांड 2 → सूक्त 11 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 2)

अथर्ववेद: | सूक्त: 11
दूष्या॒ दूषि॑रसि हे॒त्या हे॒तिर॑सि मे॒न्या मे॒निर॑सि । आ॑प्नु॒हि श्रेयां॑स॒मति॑ स॒मं क्रा॑म ॥ (१)
हे तिलक वृक्ष से निर्मित मणि! विनाश करने वाली कृत्या का तू निवारण करती है. तू युद्धों को नष्ट एवं वज्र को असफल करने वाली है. तू हम से अधिक शक्तिशाली शत्रु को मारने के लिए पकड़ तथा हमारे समान शक्तिशाली शत्रु को छोड़ कर चली जा. (१)
O gem made of tilak tree! You remove the act of destruction. You are going to destroy wars and fail thunderbolts. You hold on to kill an enemy more powerful than us and leave an enemy as powerful as us. (1)