अथर्ववेद (कांड 2)
प्रति॒ तम॒भि च॑र॒ यो ऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः । आ॑प्नु॒हि श्रेयां॑स॒मति॑ स॒मं क्रा॑म ॥ (३)
जो शत्रु हम से और हमारे पुत्रों, बांधवों तथा पशुओं से द्वेष करता है एवं हम जिस के विनाश की इच्छा करते हैं, हे मणि! तुम इन दोनों प्रकार के शत्रुओं का विनाश करो. तुम मुझ से अधिक शक्तिशाली शत्रु को मारने के लिए पकड़ो तथा मेरे समान शक्ति वाले शत्रु को छोड़ कर आगे बढ़ जाओ. (३)
The enemy who hates us and our sons, brothers and animals and whom we desire to destroy, O Gem! You destroy these two types of enemies. You hold on to kill an enemy more powerful than Me and leave the enemy of the same power as me and move forward. (3)