हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 2)

अथर्ववेद: | सूक्त: 32
उ॒द्यन्ना॑दि॒त्यः क्रिमी॑न्हन्तु नि॒म्रोच॑न्हन्तु र॒श्मिभिः॑ । ये अ॒न्तः क्रिम॑यो॒ गवि॑ ॥ (१)
उदय होते हुए तथा अस्त होते हुए सूर्य अपनी फैलने वाली किरणों के द्वारा उन कीटाणुओं का विनाश करे जो गाय के शरीर के भीतर स्थित हैं. (१)
While rising and setting, the sun, through its spreading rays, destroys the germs that are located within the cow's body. (1)

अथर्ववेद (कांड 2)

अथर्ववेद: | सूक्त: 32
वि॒श्वरू॑पं चतुर॒क्षं क्रिमिं॑ सा॒रङ्ग॒मर्जु॑नम् । शृ॒णाम्य॑स्य पृ॒ष्टीरपि॑ वृश्चामि॒ यच्छिरः॑ ॥ (२)
मैं नाना आकारों वाले, चार आंखों वाले, चितकबरे रंग के एवं धवल वर्ण के कीटाणुओं का विनाश करता हूं. मैं उन कीटाणुओं की पीठ और शीश का भी विनाश करता हूं. (२)
I destroy germs of different sizes, four eyes, mottled and bright in colour. I also destroy the back and head of those germs. (2)

अथर्ववेद (कांड 2)

अथर्ववेद: | सूक्त: 32
अ॑त्रि॒वद्वः॑ क्रिमयो हन्मि कण्व॒वज्ज॑मदग्नि॒वत् । अ॒गस्त्य॑स्य॒ ब्रह्म॑णा॒ सं पि॑नष्म्य॒हं क्रिमी॑न् ॥ (३)
हे कीटाणुओ! मैं तुम्हें उसी प्रकार पुनः उत्पन्न न होने के लिए नष्ट करता हूं, जिस प्रकार अग्नि, कण्व और जमदग्नि ऋषि ने मंत्र की शक्ति से तुम्हारा विनाश किया था. मैं अगस्त्य ऋषि के मंत्र द्वारा सभी कीटाणुओं का विनाश करता हूं. (३)
O germs! I destroy you not to be born again in the same way as the sage Agni, Kanva and Jamdagni destroyed you with the power of mantras. I destroy all germs by the mantra of Agastya Rishi. (3)

अथर्ववेद (कांड 2)

अथर्ववेद: | सूक्त: 32
ह॒तो राजा॒ क्रिमी॑णामु॒तैषां॑ स्थ॒पति॑र्ह॒तः । ह॒तो ह॒तमा॑ता॒ क्रिमि॑र्ह॒तभ्रा॑ता ह॒तस्व॑सा ॥ (४)
कीटाणुओं का राजा मारा गया एवं इन का सचिव भी मारा गया. जिन कीटाणुओं की माता, भाई और बहनें भी मारी गई थीं, वे नष्ट हो गए. (४)
The king of germs was killed and his secretary was also killed. The germs that were also killed by mothers, brothers and sisters were destroyed. (4)

अथर्ववेद (कांड 2)

अथर्ववेद: | सूक्त: 32
ह॒तासो॑ अस्य वे॒शसो॑ ह॒तासः॒ परि॑वेशसः । अथो॒ ये क्षु॑ल्ल॒का इ॑व॒ सर्वे॒ ते क्रिम॑यो ह॒ताः ॥ (५)
इन कीटाणुओं के कुल के निवास स्थान नष्ट हो गए एवं इन के घरों के आसपास के घर भी नष्ट हो गए. इस के अतिरिक्त जो कीटाणु बीज अवस्था में थे, वे भी नष्ट हो गए. (५)
The habitat of the clan of these germs was destroyed and the houses around their houses were also destroyed. Apart from this, the germs that were in the seed state were also destroyed. (5)

अथर्ववेद (कांड 2)

अथर्ववेद: | सूक्त: 32
प्र ते॑ शृणामि॒ शृङ्गे॒ याभ्यां॑ वितुदा॒यसि॑ । भि॒नद्मि॑ ते कु॒षुम्भं॒ यस्ते॑ विष॒धानः॑ ॥ (६)
हे कीटाणु! मैं तेरे उन सींगों को तोड़ता हूं, जिन के द्वारा तू व्यथा पहुंचाता है. मैं तेरे कुषुंभ नामक अंग विशेष को भी विदीर्ण करता हूं जो विष को धारण करने वाला है. (६)
O germ! I break your horns by which you cause suffering. I also scatter your particular organ called Kushumbha, which is going to contain poison. (6)