अथर्ववेद (कांड 2)
प्र ते॑ शृणामि॒ शृङ्गे॒ याभ्यां॑ वितुदा॒यसि॑ । भि॒नद्मि॑ ते कु॒षुम्भं॒ यस्ते॑ विष॒धानः॑ ॥ (६)
हे कीटाणु! मैं तेरे उन सींगों को तोड़ता हूं, जिन के द्वारा तू व्यथा पहुंचाता है. मैं तेरे कुषुंभ नामक अंग विशेष को भी विदीर्ण करता हूं जो विष को धारण करने वाला है. (६)
O germ! I break your horns by which you cause suffering. I also scatter your particular organ called Kushumbha, which is going to contain poison. (6)