हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 2.33.5

कांड 2 → सूक्त 33 → मंत्र 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 2)

अथर्ववेद: | सूक्त: 33
ऊ॒रुभ्यां॑ ते अष्ठी॒वद्भ्यां॒ पार्ष्णि॑भ्यां॒ प्रप॑दाभ्याम् । यक्ष्मं॑ भस॒द्यं श्रोणि॑भ्यां॒ भास॑दं॒ भंस॑सो॒ वि वृ॑हामि ते ॥ (५)
हे रोगी पुरुष! मैं तेरी जंघाओं से, घुटनों से, घुटनों के नीचे वाले भागों से, पैरों के पंजों से, कमर से, नितंबों से तथा गुरदों में स्थित यक्ष्मा रोग को वहां से बाहर निकालता हूं. (५)
O patient man! I get tuberculosis out of your thighs, from the knees, from the lower parts of the knees, from the toes of the feet, from the waist, from the buttocks and in the kidneys. (5)