हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 107
सम॑स्य म॒न्यवे॒ विशो॒ विश्वा॑ नमन्त कृ॒ष्टयः॑ । स॑मु॒द्राये॑व॒ सिन्ध॑वः ॥ (१)
कर्म करने वाले इंद्र के लिए सभी प्रजाएं उसी प्रकार झुकती हैं, जिस प्रकार समुद्र के लिए सभी नदियां झुक कर चलती हैं. (१)
All the subjects bow down to Indra, who does karma, in the same way as all the rivers bend for the sea. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 107
ओज॒स्तद॑स्य तित्विष उ॒भे यत्स॒मव॑र्तयत् । इन्द्र॒श्चर्मे॑व॒ रोद॑सी ॥ (२)
इंद्र ने आकाश और पृथ्वी को चर्म के समान लपेट लिया था. यह इंद्र का महान पराक्रम है. (२)
Indra had wrapped the sky and earth like skin. This is the great feat of Indra. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 107
वि चि॑द्वृ॒त्रस्य॒ दोध॑तो॒ वज्रे॑ण श॒तप॑र्वणा । शिरो॑ बिभेद वृ॒ष्णिना॑ ॥ (३)
इंद्र ने क्रोध में भरे हुए वृत्र के शीश को अपने सौ धारों वाले एवं रक्त वर्षक वज के द्वारा काट दिया था. (३)
Indra cut off the head of the vritra filled in anger with his hundred-edged and blood-bearing body. (3)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 107
तदिदा॑स॒ भुव॑नेषु॒ ज्येष्ठं॒ यतो॑ ज॒ज्ञ उ॒ग्रस्त्वे॒षनृ॑म्णः । स॒द्यो ज॑ज्ञा॒नो नि रि॑णाति॒ शत्रू॒ननु॒ यदे॑नं॒ मद॑न्ति॒ विश्व॒ ऊमाः॑ ॥ (४)
ये इंद्र शक्तिशाली, धन संपन्न तथा सभी लोकों में श्रेष्ठ हैं. ये उत्पन्न होते ही शत्रु का वध करते हैं. इन के प्रकट होते ही इन की रक्षक शक्तियां शक्तिशालिनी बन जाती हैं. (४)
This Indra is powerful, rich and superior among all worlds. They kill the enemy as soon as they are born. As soon as they appear, their protective powers become powerful. (4)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 107
वा॑वृधा॒नः शव॑सा॒ भूर्यो॑जाः॒ शत्रु॑र्दा॒साय॑ भि॒यसं॑ दधाति । अव्य॑नच्च व्य॒नच्च॒ सस्नि॒ सं ते॑ नवन्त॒ प्रभृ॑ता॒ मदे॑षु ॥ (५)
स्थावर और जंगम जगत्‌ ब्रह्म में लीन हो जाता है. शक्तिशाली शत्रु दासों को त्रास देता है. वेतन पाने वाले सैनिक युद्धों में इंद्र की ही प्रार्थना करते हैं. (५)
The stable and movable world becomes absorbed in Brahman. The powerful enemy scares the slaves. Salaried soldiers pray to Indra in wars. (5)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 107
त्वे क्रतु॒मपि॑ पृञ्चन्ति॒ भूरि॒ द्विर्यदे॒ते त्रिर्भ॑व॒न्त्यूमाः॑ । स्वा॒दोः स्वादी॑यः स्वा॒दुना॑ सृजा॒ सम॒दः सु मधु॒ मधु॑ना॒भि यो॑धीः ॥ (६)
ये वीर जन्म के संस्कार तथा युद्ध की दीक्षा लेने के कारण त्रिजन्म अर्थात्‌ तीन बार जन्म लेने वाले कहलाते हैं. इन वीरों को स्वादिष्ट पदार्थो वाला बनाओ. हे इंद्र! तुम इन वीरों में प्रवेश कर के संग्राम में तत्पर बनो. (६)
These heroes are called trijanma i.e. three-time takers due to the rites of birth and taking initiation of war. Make these heroes delicious. O Indra! You enter these heroes and be ready in the struggle. (6)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 107
यदि॑ चि॒न्नु त्वा॒ धना॒ जय॑न्तं॒ रणे॑रणे अनु॒मद॑न्ति॒ विप्राः॑ । ओजी॑यः शुष्मिन्त्स्थि॒रमा त॑नुष्व॒ मा त्वा॑ दभन्दु॒रेवा॑सः क॒शोकाः॑ ॥ (७)
हे वीर इंद्र! तुम प्रत्येक युद्ध में धनों को जीतते हो. जो ब्राह्मण तुम्हारी स्तुति करें, उन्हें तुम शक्तिशाली बनाओ. जो पुरुष दूसरों के सुख के अवसर पर दुःख देते हैं, वे तुम्हें प्राप्त न हों. (७)
O Brave Indra! You win money in every war. Make the Brahmins who praise you powerful. Men who hurt on the occasion of the happiness of others, they should not be received by you. (7)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 107
त्वया॑ व॒यं शा॑शद्महे॒ रणे॑षु प्र॒पश्य॑न्तो यु॒धेन्या॑नि॒ भूरि॑ । चो॒दया॑मि त॒ आयु॑धा॒ वचो॑भिः॒ सं ते॑ शिशामि॒ ब्रह्म॑णा॒ वयां॑सि ॥ (८)
हे इंद्र! रणभूमि में हम तुम्हारे द्वारा ही अपने विरोधियों की हिंसा करते हैं. मैं अपने तप के द्वारा सिद्धि प्राप्त वचनों से तुम्हारे आयुधों को प्रेरित करता हूं तथा पक्षियों के समान वेग वाले तुम्हारे बाणों को तीक्ष्ण बनाता हूं. (८)
O Indra! In the battlefield, we commit violence against our opponents through you. I inspire your weapons with the words accomplished through my penance and sharpen your arrows with the same velocity as birds. (8)
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