अथर्ववेद (कांड 20)
चि॒त्रं दे॒वाना॒मुद॑गा॒दनी॑कं॒ चक्षु॑र्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्या॒ग्नेः । आप्रा॒द्द्यावा॑पृथि॒वी अ॒न्तरि॑क्षं॒ सूर्य॑ आ॒त्मा जग॑तस्त॒स्थुष॑श्च ॥ (१४)
किरणों का पूजनीय समूह मित्र, वरुण तथा अग्नि के चक्षु के रूप में उदय हो रहा है. ये सूर्य ही प्राणियों की आत्मा तथा अपनी महिमा से आकाश, पृथ्वी और अंतरिक्ष को पूर्ण करते हैं. (१४)
The revered group of rays is emerging as friends, Varuna and Agni's eye. These suns complete the sky, earth and space with the spirit of beings and their glory. (14)