हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.11.6

कांड 20 → सूक्त 11 → मंत्र 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 11
म॒हो म॒हानि॑ पनयन्त्य॒स्येन्द्र॑स्य॒ कर्म॒ सुकृ॑ता पु॒रूणि॑ । वृ॒जने॑न वृजि॒नान्त्सं पि॑पेष मा॒याभि॑र्द॒स्यूँर॒भिभू॑त्योजाः ॥ (६)
इंद्र ने जो अनेक प्रशंसनीय कार्य किए हैं, श्रोता उन की प्रशंसा करते हैं. शत्रुओं को वश में करने वाले इंद्र ने पापी राक्षसों को अपने अस्त्रो से नष्ट कर दिया है तथा शक्तिशाली असुरों का विनाश कर दिया. (६)
The audience appreciates the many commendable works that Indra has done. Indra, who subdued the enemies, has destroyed the sinful demons with his astro and destroyed the powerful asuras. (6)