हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 111
यत्सोम॑मिन्द्र॒ विष्ण॑वि॒ यद्वा॑ घ त्रि॒त आ॒प्त्ये । यद्वा॑ म॒रुत्सु॒ मन्द॑से॒ समिन्दु॑भिः ॥ (१)
हे इंद्र! त्रित और आप्य यज्ञ में जो तुम हर्षित होते हो, उस हर्ष का कारण जल पूर्ण सोमरस ही है. (१)
O Indra! The reason for the joy that you rejoice in the Trit and Apya Yajna is the water-full Somaras. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 111
यद्वा॑ शक्र परा॒वति॑ समु॒द्रे अधि॒ मन्द॑से । अ॒स्माक॒मित्सु॒ते र॑णा॒ समिन्दु॑भिः ॥ (२)
हे इंद्र! या तो तुम दूर स्थित सागर में अथवा हमारे यज्ञ में हर्ष को प्राप्त होते हो. तुम वास्तव में जल पूर्ण सोम के कारण ही हर्षित होते हो. (२)
O Indra! Either you attain joy in the ocean located far away or in our yajna. You are really happy because of the water full soma. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 111
यद्वासि॑ सुन्व॒तो वृ॒धो यज॑मानस्य सत्पते । उ॒क्थे वा॒ यस्य॒ रण्य॑सि॒ समिन्दु॑भिः ॥ (३)
हे इंद्र! तुम सोमरस का संस्कार करने वाले यजमान की वृद्धि करते हो. उस वृद्धि का कारण वास्तव में जल पूर्ण सोम ही है. (३)
O Indra! You increase the host who performs the sacrament of Someras. The reason for that increase is actually water full Som. (3)