हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.111.2

कांड 20 → सूक्त 111 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 111
यद्वा॑ शक्र परा॒वति॑ समु॒द्रे अधि॒ मन्द॑से । अ॒स्माक॒मित्सु॒ते र॑णा॒ समिन्दु॑भिः ॥ (२)
हे इंद्र! या तो तुम दूर स्थित सागर में अथवा हमारे यज्ञ में हर्ष को प्राप्त होते हो. तुम वास्तव में जल पूर्ण सोम के कारण ही हर्षित होते हो. (२)
O Indra! Either you attain joy in the ocean located far away or in our yajna. You are really happy because of the water full soma. (2)