हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.111.3

कांड 20 → सूक्त 111 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 111
यद्वासि॑ सुन्व॒तो वृ॒धो यज॑मानस्य सत्पते । उ॒क्थे वा॒ यस्य॒ रण्य॑सि॒ समिन्दु॑भिः ॥ (३)
हे इंद्र! तुम सोमरस का संस्कार करने वाले यजमान की वृद्धि करते हो. उस वृद्धि का कारण वास्तव में जल पूर्ण सोम ही है. (३)
O Indra! You increase the host who performs the sacrament of Someras. The reason for that increase is actually water full Som. (3)