हरि ॐ
अथर्ववेद (Atharvaved)
अथर्ववेद (कांड 20)
अ॒हमिद्धि पि॒तुष्परि॑ मे॒धामृ॒तस्य॑ ज॒ग्रभ॑ । अ॒हं सूर्य॑ इवाजनि ॥ (१)
मैं सूर्य के समान उत्पन्न हुआ हूं. मैं ने अपने पिता ब्रह्मा की बुद्धि प्राप्त की है. (१)
I was born like the sun. I have attained the wisdom of my father Brahma. (1)
अथर्ववेद (कांड 20)
अ॒हं प्र॒त्नेन॒ मन्म॑ना॒ गिरः॑ शुम्भामि कण्व॒वत् । येनेन्द्रः॒ शुष्म॒मिद्द॒धे ॥ (२)
मैं प्राचीन स्तोत्र के द्वारा अपनी वाणियों को सुसज्जित करता हुआ इंद्र को शक्तिशाली बनाता हूं. (२)
I make Indra powerful by equipping my speeches through ancient stotras. (2)
अथर्ववेद (कांड 20)
ये त्वामि॑न्द्र॒ न तु॑ष्टु॒वुरृष॑यो॒ ये च॑ तुष्टु॒वुः । ममेद्व॑र्धस्व॒ सुष्टु॑तः ॥ (३)
हे इंद्र! जिन ऋषियों ने तुम्हारी स्तुति नहीं की है, उन से उदासीन रहते हुए तुम मेरी स्तुति से ही वृद्धि प्राप्त करो. (३)
O Indra! Be indifferent to the sages who have not praised you, and get growth only by my praise. (3)