हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.115.2

कांड 20 → सूक्त 115 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 115
अ॒हं प्र॒त्नेन॒ मन्म॑ना॒ गिरः॑ शुम्भामि कण्व॒वत् । येनेन्द्रः॒ शुष्म॒मिद्द॒धे ॥ (२)
मैं प्राचीन स्तोत्र के द्वारा अपनी वाणियों को सुसज्जित करता हुआ इंद्र को शक्तिशाली बनाता हूं. (२)
I make Indra powerful by equipping my speeches through ancient stotras. (2)