अथर्ववेद (कांड 20)
उ॒क्ष्णो हि मे॒ पञ्च॑दश सा॒कं पच॑न्ति विंश॒तिम् । उ॒ताहम॑द्मि॒ पीव॒ इदु॒भा कु॒क्षी पृ॑णन्ति मे॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥ (१४)
मुझ महान के पंद्रह सेवक बीस प्रकार की हवि का पाक करते हैं. मैं उन हवियों का सेवन करता हूं. इस प्रकार मेरी दोनों कोखें भरी हुई हैं. इंदर सर्वश्रेष्ठ हैं. (१४)
Fifteen servants of me the Great cook twenty kinds of havi. I consume those hives. Thus both my wombs are full. Inder is the best. (14)