अथर्ववेद (कांड 20)
वृ॑ष॒भो न ति॒ग्मशृ॑ङ्गो॒ऽन्तर्यू॒थेषु॒ रोरु॑वत् । म॒न्थस्त॑ इन्द्र॒ शं हृ॒दे यं ते॑ सु॒नोति॑ भाव॒युर्विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥ (१५)
हे इंद्र! जिस प्रकार सींगों वाले बैल गायों में शब्द करते हैं, उसी प्रकार जिन के हृदय को तुम्हारा मंथन सुख देता है, वही सुख प्राप्त करता है, वयोंकि इंद्र सर्वोत्कृष्ट हैं. (१५)
O Indra! Just as horned bulls say words in cows, so those whose heart your churning gives happiness, they attain happiness, and because Indra is the best. (15)