हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.126.2

कांड 20 → सूक्त 126 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 126
परा॒ हीन्द्र॒ धाव॑सि वृ॒षाक॑पे॒रति॒ व्यथिः॑ । नो अह॒ प्र वि॑न्दस्य॒न्यत्र॒ सोम॑पीतये॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥ (२)
हे इंद्र! तुम वृषाकपि की अपेक्षा अधिक वेग वाले हो. तुम शत्रुओं को व्यथित करने में समर्थ हो. जहां सोमपान का साधन नहीं होता, वहां तुम नहीं जाते हो. इस प्रकार इंद्र सब से बढ़ कर हैं. (२)
O Indra! You are more at a faster pace than Taurus. You are capable of disturbing enemies. Where there is no means of sompan, you do not go there. Thus Indra is the most important. (2)