अथर्ववेद (कांड 20)
पुन॒रेहि॑ वृषाकपे सुवि॒ता क॑ल्पयावहै । य ए॒ष स्व॑प्न॒नंश॒नोऽस्त॒मेषि॑ प॒था पुन॒र्विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥ (२१)
हे वृषाकपि! तुम उदित हो कर स्वप्न को नष्ट कर देते हो. इस के बाद तुम अस्त हो जाते हो. तुम पुनः आओ, जिस से हम सब के हित में यज्ञ कर्म की योजना बनाएं. इंद्र सब से श्रेष्ठ हैं. (२१)
O Taurus! You rise and destroy the dream. After this you set. You come again, so that we plan the yajna karma in the interest of all of us. Indra is the best of all. (21)