हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.126.22

कांड 20 → सूक्त 126 → मंत्र 22 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 126
यदुद॑ञ्चो वृषाकपे गृ॒हमि॒न्द्राज॑गन्तन । क्व स्य पु॑ल्व॒घो मृ॒गः कम॑गं जन॒योप॑नो॒ विश्व॑स्मा॒दिन्द्र॒ उत्त॑रः ॥ (२२)
हे वृषाकपि! तुम उत्तर में निवास करते हो तथा सभी भुवनों का चक्कर लगाते हुए छिपते हो. उस समय सभी लोक अंधकार के कारण आश्चर्य में पड़ जाते हैं तथा कहते हैं कि सूर्य कहां गए? प्राणियों को मोहने वाले इंद्र सर्वश्रेष्ठ हैं. (२२)
O Taurus! You live in the north and hide while circling all the bhuvanas. At that time, all the people are surprised due to darkness and say that where has the sun gone? Indra is the best to entice creatures. (22)