अथर्ववेद (कांड 20)
म॑हान॒ग्न्युप॑ ब्रूते स्वसा॒वेशि॑तं॒ पसः॑ । इ॒त्थं फल॑स्य॒ वृक्ष॑स्य॒ शूर्पे॑ शूर्पं॒ भजे॑महि ॥ (९)
महान अग्नि का कथन है कि यह पापनाशक ओषधि भलीभांति उत्तेजित की गई है. हम फल वाले वृक्ष के सूपों में सूप को प्रविष्ट करते हैं. (९)
The great agni says that this sin-killing medicine has been well stimulated. We insert the soup into the soups of the fruit tree. (9)