अथर्ववेद (कांड 20)
म॑हान॒ग्नी कृ॑कवाकं॒ शम्य॑या॒ परि॑ धावति । अ॒यं न॑ वि॒द्म यो मृ॒गः शी॒र्ष्णा ह॑रति॒ धाणि॑काम् ॥ (१०)
महान अग्नि कृक शब्द करने वाले पर दौड़ते हैं. हमें यह ज्ञात है कि वे मृग के समान शीश के द्वारा मौन अर्पण का हरण करते हैं. (१०)
The great agni is running on the one who does the word. We know that they remove the silent offering through an antelope-like head. (10)