अथर्ववेद (कांड 20)
तं वां॒ रथं॑ व॒यम॒द्या हु॑वेम पृथु॒ज्रय॑मश्विना॒ संग॑तिं॒ गोः । यः सू॒र्यां वह॑ति वन्धुरा॒युर्गिर्वा॑हसं पुरु॒तमं॑ वसू॒युम् ॥ (१)
हे अश्विनीकुमारो! आज हम तुम्हारे वेगवान रथ का आह्वान करते हैं. तुम्हारा वह रथ ऊंचेनीचे स्थानों में जाता हुआ सूर्या को वहन करता है. वह रथ वाणी को वहन करने वाला, वसुओं को प्राप्त करने वाला तथा गायों से सुसंगत है. मैं उसी रथ को बुलाता हूं. (१)
O Ashwinikumaro! Today we call on your fast chariot. That chariot of yours carries the sun while going to the high places. That chariot carries speech, receives vasus and is compatible with cows. I call the same chariot. (1)