हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 23
आ तू न॑ इन्द्र म॒द्र्यग्घुवा॒नः सोम॑पीतये । हरि॑भ्यां याह्यद्रिवः ॥ (१)
हे वज्रधारी इंद्र! हमारे द्वारा आह्वान करने पर तुम सोमरस का पान करने के लिए अपने अश्वां द्वारा हमारे यज्ञ में आओ. (१)
O Vajradhari Indra! When invoked by us, you come to our yagna by your horse to drink Someras. (1)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 23
स॒त्तो होता॑ न ऋ॒त्विय॑स्तिस्ति॒रे ब॒र्हिरा॑नु॒षक् । अयु॑ज्रन्प्रा॒तरद्र॑यः ॥ (२)
हे इंद्र! हमारे यज्ञ में होता नाम का ऋत्विज्‌ समय पर उपस्थित हो कर बैठे. हमारे यज्ञ में कुश एकदूसरे से मिले हुए बिछे. सोमरस कूटने के लिए प्रातः स्वप्न में पत्थर एकदूसरे से मिले. (२)
O Indra! In our yajna, the name of The Ritvij sat on time. In our yajna, Kush met each other. In the morning, stones met each other in the morning to crush Someras. (2)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 23
इ॒मा ब्रह्म॑ ब्रह्मवाहः क्रि॒यन्त॒ आ ब॒र्हिः सी॑द । वी॒हि शू॑र पुरो॒डाश॑म् ॥ (३)
हे इंद्र! हम तुम्हारी स्तुति कर रहे हैं. तुम इन कुशाओं पर बैठी. हे वीर! कुशाओं पर बैठ कर तुम हमारे द्वारा दिए गए पुरोडाश का भक्षण करो. (३)
O Indra! We are praising you. You sat on these cushions. O heroic! Sit on the kushas and eat the purodash given by us. (3)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 23
रा॑र॒न्धि सव॑नेषु ण ए॒षु स्तोमे॑षु वृत्रहन् । उ॒क्थेष्वि॑न्द्र गिर्वणः ॥ (४)
हे स्तुतियों द्वारा सेवा करने योग्य तथा वृत्रासुर का वध करने वाले इंद्र! हमारे तीनों सवनो में की जाती हुई स्तुतियों से प्रसन्न बनो. (४)
O Indra, worthy of service by eulogies and who kills Vritrasura! Be happy with the praises made in our three savanas. (4)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 23
म॒तयः॑ सोम॒पामु॒रुं रि॒हन्ति॒ शव॑स॒स्पति॑म् । इन्द्रं॑ व॒त्सं न मा॒तरः॑ ॥ (५)
हमारी स्तुतियां महान सोमरस का पान करने वाले तथा बल के स्वामी इंद्र को उसी प्रकार प्राप्त होती हैं, जिस प्रकार गाय अपने बछड़े को चाटती है. (५)
Our praises are received by Indra, the beteloper of the great Someras and the swami of the force, in the same way as the cow licks its calf. (5)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 23
स म॑न्दस्वा॒ ह्यन्ध॑सो॒ राध॑से त॒न्वा म॒हे । न स्तो॒तारं॑ नि॒दे क॑रः ॥ (६)
हे इंद्र! तुम अपने शरीर में बल प्राप्त करने के लिए सोमरस पी कर प्रसन्न बनो. मुझे अधिक धन देने के लिए तुम हर्षित होओ. मैं तुम्हारा स्तोता हूं. मुझे दूसरे का निंदक मत बनाओ. (६)
O Indra! You become happy by drinking somras to gain strength in your body. You are happy to give me more money. I am your host. Don't make me a slanderer of others. (6)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 23
व॒यमि॑न्द्र त्वा॒यवो॑ ह॒विष्म॑न्तो जरामहे । उ॒त त्वम॑स्म॒युर्व॑सो ॥ (७)
हे इंद्र! हम सोम रूप हवि से युक्त हो कर तुम्हारी कामना करते हैं. हे सब को वास देने वाले इंद्र! तुम हमें मनचाहा फल देने के लिए प्रसन्न बनो. (७)
O Indra! We wish you with the form of Soma. O Indra, who dwells to all! Be happy to give us the fruits you want. (7)

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 23
मारे अ॒स्मद्वि मु॑मुचो॒ हरि॑प्रिया॒र्वाङ्या॑हि । इन्द्र॑ स्वधावो॒ मत्स्वे॒ह ॥ (८)
हे इंद्र! तुम अश्चों को प्रेम करने वाले हो. अपने अश्चों को तुम हम से दूर रथ से अलग मत करो. तुम अश्च युक्त रथ पर चढ़े हुए ही हमारे यज्ञ में आओ. यहां आ कर तुम सोमरस पियो और हर्ष पूर्ण बनो. (८)
O Indra! You are going to love the ashes. Don't separate your horses from the chariot you're away from us. Come to our yajna only while climbing on a chariot with tears. Come here and drink somerous and be happy. (8)
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