हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.34.6

कांड 20 → सूक्त 34 → मंत्र 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 34
यो र॒ध्रस्य॑ चोदि॒ता यः कृ॒शस्य॒ यो ब्र॒ह्मणो॒ नाध॑मानस्य की॒रेः । यु॒क्तग्रा॑व्णो॒ योऽवि॒ता सु॑शि॒प्रः सु॒तसो॑मस्य॒ स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥ (६)
जो इंद्र निर्धनों को धन देते हैं और असहायों की सहायता करते हैं, जो स्तुति करने वाले ब्राह्मणों को मनचाहा फल प्रदान करते हैं, जिन की चिबुक अर्थात्‌ ठुड्डी सुंदर है तथा जो सोम का संस्कार करने वाले यजमानों के रक्षक हैं, हे मनुष्यो! वे ही इंद्र हैं. (६)
Indra, who gives money to the poor and helps the helpless, who gives the desired results to the praising Brahmins, whose chin is beautiful and who is the protector of the hosts who perform the sacrament of Soma, O men! He is Indra. (6)