हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.34.7

कांड 20 → सूक्त 34 → मंत्र 7 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 34
यस्याश्वा॑सः प्र॒दिशि॒ यस्य॒ गावो॒ यस्य॒ ग्रामा॒ यस्य॒ विश्वे॒ रथा॑सः । यः सूर्यं॒ य उ॒षसं॑ ज॒जान॒ यो अ॒पां ने॒ता स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥ (७)
जिन के पास मांगने वालों को देने के लिए बहुत सी गाएं, अश्व, ग्राम, रथ, गज, ऊंट आदि सब कुछ है, जिन्होंने प्रकाश के लिए सूर्य का उदय किया है तथा उषा को प्रकट किया है, जो वर्षा के जल के प्रेरक हैं, वे ही इंद्र हैं. (७)
Those who have many cows, horses, villages, chariots, yards, camels, etc. to give to those who ask for it, who have risen the sun for light and revealed Usha, who are the originators of rain water, are Indra. (7)