हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.47.1

कांड 20 → सूक्त 47 → मंत्र 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 47
तमिन्द्रं॑ वाजयामसि म॒हे वृ॒त्राय॒ हन्त॑वे । स वृषा॑ वृष॒भो भु॑वत् ॥ (१)
कामनाओं की वर्षा करने वाले इंद्र सभी देवों से श्रेष्ठ बनें. हम वृत्र राक्षस का नाश करने के लिए इंद्र को शक्तिशाली बनाते हैं. (१)
May Indra, who showers desires, be superior to all gods. We make Indra powerful to destroy the vritra demon. (1)