हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.59.4

कांड 20 → सूक्त 59 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 59
मन्त्र॒मख॑र्वं॒ सुधि॑तं सु॒पेश॑सं॒ दधा॑त य॒ज्ञिये॒ष्वा । पू॒र्वीश्च॒न प्रसि॑तयस्तरन्ति॒ तं य इन्द्रे॒ कर्म॑णा॒ भुव॑त् ॥ (४)
. स्तोताओ! ऐसे यज्ञ संबंधी मंत्रों का उच्चारण करो जो सुंदर, तेज और रूप प्रदान करने में समर्थ हों. इंद्र की सेवा करने वाला मनुष्य सभी बंधनों से छुटकारा पा जाता है. (४)
. Stotao! Chant yajna-related mantras that are beautiful, sharp and capable of giving form. A person who serves Indra gets rid of all the bonds. (4)