अथर्ववेद (कांड 20)
वृषा॑ यू॒थेव॒ वंस॑गः कृ॒ष्टीरि॑य॒र्त्योज॑सा । ईशा॑नो॒ अप्र॑तिष्कुतः ॥ (१४)
हे इंद्र! तुम कृषियों को संपन्न करने वाली शक्ति से जलों की वर्षा करते हो. ईशान नाम वाले इंद्र का तिरस्कार कोई नहीं कर सकता. (१४)
O Indra! You rain water with the power that sustains agriculture. No one can despise Indra named Ishaan. (14)