हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 20.70.13

कांड 20 → सूक्त 70 → मंत्र 13 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 20)

अथर्ववेद: | सूक्त: 70
तु॒ञ्जेतु॑ञ्जे॒ य उत्त॑रे॒ स्तोमा॒ इन्द्र॑स्य व॒ज्रिणः॑ । न वि॑न्धे अस्य सुष्टु॒तिम् ॥ (१३)
मैं धन प्राप्ति के प्रत्येक अवसर पर तथा सदैव धन प्राप्त करने पर धन से संतुष्ट होता हूं. मैं जिन स्तोत्रों का स्मरण करता हूं, उन में इंद्र की महिमा की कोई सीमा नहीं होती. (१३)
I am satisfied with money on every occasion of getting money and always on getting money. In the stotras I remember, there is no limit to the glory of Indra. (13)