अथर्ववेद (कांड 20)
पृथ॒क्प्राय॑न्प्रथ॒मा दे॒वहू॑त॒योऽकृ॑ण्वत श्रव॒स्यानि दु॒ष्टरा॑ । न ये शे॒कुर्य॒ज्ञियां॒ नाव॑मा॒रुह॑मी॒र्मैव ते न्य॑विशन्त॒ केप॑यः ॥ (६)
हे इंद्र! जो जन अपने ज्ञान और कर्म के अनुसार देवयान आदि मार्गो में जाने की कामना करते हैं तथा जो सर्वसाधारण के लिए कष्टसाध्य देवहूति आदि कर्म करते हैं, वे तुम्हारी कृपा के अभाव में यज्ञरूपी नौका पर नहीं चढ़ पाते. इस कारण से वे साधारण कर्म करते हुए मृत्युलोक में ही रुके रहते हैं. (६)
O Indra! Those who wish to go to the path of Devayan etc. according to their knowledge and karma and who do painful devhuti etc. for the common man, they are not able to board the yagya boat due to lack of your grace. For this reason, they stay in the land of death while doing simple deeds. (6)