अथर्ववेद (कांड 3)
इ॒यमे॒व सा या प्र॑थ॒मा व्यौच्छ॑दा॒स्वित॑रासु चरति॒ प्रवि॑ष्टा । म॒हान्तो॑ अस्यां महि॒मानो॑ अ॒न्तर्व॒धूर्जि॑गाय नव॒गज्जनि॑त्री ॥ (४)
यह आज की एकाष्टक लक्षणा वह प्रथम उत्पन्न उषा है, जिस ने सृष्टि के आरंभ में उत्पन्न हो कर अंधकार का विनाश किया था. वही उषा इन दिखाई देने वाली अन्य उषाओं में अनुगत हो कर उदित होती है. इस उषा में असीमित महिमा है. इस में सूर्य, अग्नि और सोम का निवास है. सूर्य की पत्नी, यह उषा प्राणियों को प्रकाश देती हुई सब से उत्तम रहे. (४)
This is the first born Usha of today, who was born at the beginning of creation and destroyed darkness. The same Usha rises in these other visible ushas. There is unlimited glory in this usha. It is inhabited by Sun, Agni and Soma. The wife of the sun, may usha be the best of all, giving light to the creatures. (4)