हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 3.11.4

कांड 3 → सूक्त 11 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 11
श॒तं जी॑व श॒रदो॒ वर्ध॑मानः श॒तं हे॑म॒न्तान्छ॒तमु॑ वस॒न्तान् । श॒तं त॒ इन्द्रो॑ अ॒ग्निः स॑वि॒ता बृह॒स्पतिः॑ श॒तायु॑षा ह॒विषाहा॑र्षमेनम् ॥ (४)
हे रोग से मुक्त पुरुष! तुम प्रतिदिन वृद्धि प्राप्त करते हुए सौ शरद ऋतुओं, सौ हेमंत ऋतुओं और सौ वसंत ऋतु.ओं तक जीवित रहो. इंद्र, अग्नि, सविता और बृहस्पति तुम्हें सौ वर्ष की आयु प्रदान करें. सैकड़ों वर्ष की आयु प्रदान करने वाले हवि के द्वारा मैं इसे मृत्यु के पास से लौटा लाया हूं. (४)
O man free of disease! You survive to a hundred autumns, hundred autumns and hundred springs while achieving growth daily. May Indra, Agni, Savita and Jupiter give you a hundred years of age. I have brought it back from near death by Havi, who gave me hundreds of years of age. (4)