हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 3.13.6

कांड 3 → सूक्त 13 → मंत्र 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 13
आदित्प॑श्याम्यु॒त वा॑ शृणो॒म्या मा॒ घोषो॑ गच्छति॒ वाङ्मा॑साम् । मन्ये॑ भेजा॒नो अ॒मृत॑स्य॒ तर्हि॒ हिर॑ण्यवर्णा॒ अतृ॑पं य॒दा वः॑ ॥ (६)
इस के पश्चात मैं देखता हूं और सुनता हूं कि बोले जाते हुए शब्द मेरी वाणी को प्राप्त हो रहे हैं. मैं कल्पना करता हूं कि उन जलों के आने से ही मुझे अमृत प्राप्त हुआ है. हे सुनहरे रंग वाले जलो! तुम्हारे सेवन से मैं तृप्त हो गया हूं. (६)
After this, I see and hear that the spoken words are being received by my speech. I imagine that it is only by the arrival of those waters that I have received nectar. O golden-colored burn! I am satisfied with your consumption. (6)