अथर्ववेद (कांड 3)
घृ॒तेन॒ सीता॒ मधु॑ना॒ सम॑क्ता॒ विश्वै॑र्दे॒वैरनु॑मता म॒रुद्भिः॑ । सा नः॑ सीते॒ पय॑सा॒भ्याव॑वृ॒त्स्वोर्ज॑स्वती घृ॒तव॒त्पिन्व॑माना ॥ (९)
हे जुती हुई भूमि! तू मधुर स्वाद वाले जल से भली प्रकार सिंची हुई हो कर तथा विश्वे देव और मरुतों द्वारा अनुमति पा कर जल सहित हमारे सामने आ. तू शक्ति संपन्न हो कर घी से मिले हुए अन्न को सींचने वाली है. (९)
O land of old! You are well irrigated with sweet tasted water and come before us with water after getting permission from the gods and maruts. (9)