अथर्ववेद (कांड 3)
वाज॑स्य॒ नु प्र॑स॒वे सं ब॑भूविमे॒मा च॒ विश्वा॒ भुव॑नानि अ॒न्तः । उ॒तादि॑त्सन्तं दापयतु प्रजा॒नन्र॒यिं च॑ नः॒ सर्व॑वीरं॒ नि य॑च्छ ॥ (८)
हम अन्न उत्पन्न करने वाले कर्म को शीघ्र प्राप्त करे. दिखाई देने वाले सभी प्राणी वाज प्रसव अर्थात् वृष्टि द्वारा अन्न पैदा करने वाले देव के मध्य निवास करते हैं. सभी प्राणियों के हृदय के अभिप्राय को जानने वाले वाज-प्रसव देव दान न करने वाले मुझ पुरुष को धन दान करने की प्रेरणा दें तथा हमारे धन को पुत्र, पौत्र आदि से युक्त करें. (८)
Let us quickly achieve the work that produces food. All the visible beings reside in the midst of the god who produces food through rain. May god, who knows the meaning of the heart of all beings, inspire me to donate money to my man who does not donate and make our wealth rich with sons, grandsons, etc. (8)