अथर्ववेद (कांड 3)
दु॒ह्रां मे॒ पञ्च॑ प्र॒दिशो॑ दु॒ह्रामु॒र्वीर्य॑थाब॒लम् । प्रापे॑यं॒ सर्वा॒ आकू॑ती॒र्मन॑सा॒ हृद॑येन च ॥ (९)
पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण एवं इन की मध्यवर्ती दिशा-इस प्रकार पांच दिशाएं, पृथ्वी, आकाश, दिन, रात, जल, तथा जड़ीबूटियां मुझे अभिमत फल दें. मैं हृदय और अंतःकरण से उत्पन्न संकल्पों को प्राप्त करूं. (९)
East, West, North, South and the middle direction of these - thus the five directions, earth, sky, day, night, water, and herbs give me the fruits. May I achieve resolutions arising from the heart and heart. (9)