हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 3.24.4

कांड 3 → सूक्त 24 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 24
उदुत्सं॑ श॒तधा॑रं स॒हस्र॑धार॒मक्षि॑तम् । ए॒वास्माके॒दं धा॒न्यं॑ स॒हस्र॑धार॒मक्षि॑तम् ॥ (४)
जल की उत्पत्ति का स्थान सौ अथवा हजार धाराओं वाला होने पर भी कभी क्षीण नहीं होता है, इसी प्रकार हमारा यह धान्य अनेक प्रकार से हजार धाराओं वाला हो कर क्षय रहित बने. (४)
The place of origin of water never weakens even if it is with a hundred or thousand streams, in the same way, this grain of ours becomes thousands of streams in many ways and becomes decay-free. (4)