हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 3.30.5

कांड 3 → सूक्त 30 → मंत्र 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 30
ज्याय॑स्वन्तश्चि॒त्तिनो॒ मा वि यौ॑ष्ट संरा॒धय॑न्तः॒ सधु॑रा॒श्चर॑न्तः । अ॒न्यो अ॒न्यस्मै॑ व॒ल्गु वद॑न्त॒ एत॑ सध्री॒चीना॑न्वः॒ संम॑नसस्कृणोमि ॥ (५)
हे मनुष्यो! तुम छोटेबड़े की भावना से एक दूसरे का अनुसरण करते हुए समान चित्त वाले, समान सिद्धि वाले तथा समान कार्य करने वाले बनो. इस प्रकार आचरण करते हुए तुम एक दूसरे से बिछुड़ो मत तथा एक दूसरे से प्रिय वचन बोलते हुए आओ. मैं भी तुम सब से मिलकर तुम्हें कार्यो में प्रवृत्त होने वाला तथा समान विचारों वाला बनाता हूं. (५)
O men! You follow each other with the spirit of small and big, become one with the same mind, the same accomplishment and the one who does the same work. While behaving in this way, do not get separated from each other and come speaking dear words to each other. I also meet you all and make you engaged in work and have similar views. (5)