अथर्ववेद (कांड 3)
स॑मा॒नी प्र॒पा स॒ह वो॑ऽन्नभा॒गः स॑मा॒ने योक्त्रे॑ स॒ह वो॑ युनज्मि । स॒म्यञ्चो॒ऽग्निं स॑पर्यता॒रा नाभि॑मिवा॒भितः॑ ॥ (६)
हे समानता के इच्छुक जनो! तुम परस्पर प्रेम के कारण एक स्थान पर रह कर समान जल और अन्न का उपयोग करो. इस के लिए मैं तुम सब को प्रेम के एक बंधन में बांधता हूं. जिस प्रकार पहिए के अनेक अरे एक नाभि को घेरे रहते हैं, उसी प्रकार तुम सब एक फल की कामना करते हुए अग्नि की उपासना करो. (६)
O people who want equality! You should live in one place due to mutual love and use the same water and food. For this, I bind you all in a bond of love. Just as many of the wheels surround one navel, so you all worship agni while wishing for one fruit. (6)