हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 3.31.2

कांड 3 → सूक्त 31 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 3)

अथर्ववेद: | सूक्त: 31
व्यार्त्या॒ पव॑मानो॒ वि श॒क्रः पा॑पकृ॒त्यया॑ । व्यहं सर्वे॑ण पा॒प्मना॒ वि यक्ष्मे॑ण॒ समायु॑षा ॥ (२)
वायु इस बालक को रोगजनित पीड़ा से अलग रखे तथा इंद्र पाप के कार्यो से बचाएं. मैं इसे रोग आदि दुःखों को उत्पन्न करने वाले पापों तथा यक्ष्मा रोग से पृथकू कर के चिर जीवन से युक्त करता हूं. (२)
Keep this child away from pathatable pain and save Indra from the actions of sin. I separate it from the sins causing diseases and sorrows and tuberculosis and make it a long life. (2)