अथर्ववेद (कांड 4)
प्र॒जाप॑तिः सलि॒लादाः स॑मु॒द्रादाप॑ ई॒रय॑न्नुद॒धिम॑र्दयाति । प्र प्या॑यतां॒ वृष्णो॒ अश्व॑स्य॒ रेतो॒ऽर्वाङे॒तेन॑ स्तनयि॒त्नुनेहि॑ ॥ (११)
प्रजाओं के पालक सूर्य व्यापक सागर से जलों को वर्षा के निमित्त प्रेरित करते हुए पीड़ित करें. व्यापक एवं घोड़े के समान वेग वाले मेघ का वर्षा जल रूपी वीर्य वृद्धि को प्राप्त हो. हे पर्जन्य! तुम इस शक्तिशाली मेघ के द्वारा हमारे सामने आओ. (११)
The sun, the guardian of the subjects, should suffer by inducing water from the wide ocean for rain. The semen of the wide and horse-like cloud should be increased in the form of rainwater. O Parjanya! You come before us through this mighty cloud. (11)